PD ACT (Preventive Detention Act) in Hindi क्या है ? जानिए विस्तार से इसके बारे में

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PD ACT -पीडी एक्ट (Preventive Detention Act) जिसे हम निवारक नजरबंदी कानून, प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट,या एहतियातन हिरासत इन नामों से जानते है।इस एक्ट को जानना इसलिए भी जरूरी है। क्योकि यह एक्ट हमेशा से ही विवादो में रहता है। हाल ही में ऐसी एक्ट के तहत तेलंगाना से बीजेपी से निलबित विधायक राजा सिंह को गिरफ्तार किया गया है।
पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के मामले में राजा सिंह को पुलिस ने PD ACT के तहत गिरफ्तार कर दोबारा जेल भेज दिया है। 23 अगस्त को गिरफ्तार हुए राजा सिंह को लोकल कोर्ट से ज़मानत मिल गई थी। इस से हैदराबाद सहर के मुस्लिक समुदाय के लोगो के द्वारा सडको पर विरोध प्रदर्शन किया जा रह है।

PD ACT(Preventive Detention Act) आखिर है, क्या ?

PD ACT सर्वप्रथम संसद के द्वारा 1950 में एक वर्ष के लिए पास किआ गया था। और सन 1951 में संशोधित रूप से पास किया गया। सन 1952 ,1953 ,1954 में इसे तीन वर्ष यानी की 1957 तक पास किया गया। इसके बाद हर तीन वर्ष के बाद इसे यानि 1960, 1963 ,1966 ,में तीन तीन वर्ष के लिए पास किया गया था। सन 1966 के बाद संसद से इसे दोबारा पास नहीं किया।
PD ACT -पीडी एक्ट जिसे हम निवारक नजरबंदी कानून, प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट भी कहते है। इसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है ,फिर भी हम इसे आसान भाषा में समझने का प्रयाश करेंगे। इसका मुख्या उदेश्य किसी व्यक्ति द्वारा की किए गए अपराध पर दंड देना नहीं होता ,बल्की अपराध को करने से पहले ही उसे जेल में भेज देना होता है। मतलब की अगर पुलिस को किसी व्यक्ति पर सक है की वह कोई अपराध करने वाले है जो की किसी समाज या देश के लिए खतरा हो सकता है  जिससे समाज में शान्ति भंग होने का खतरा बढ़ता जाता है .तो पुलिस उसे उसकी गिरफ्तारी का कारण बताये बिना भी उसे जेल में भेज सकती है। और न ही उसे उसकी गिरफ्तारी का कारण बताने की जरूरत पड़ती है।  और न ही उसे 24 घंटे के अंदर मजिस्‍ट्रेट के सामने पेश करने की भी बाध्‍यता नहीं होती।
विदेशो में PD ACT का प्रयोग केवल युद्ध या आपातकाल के दौरान ही किसी व्यक्ति पर लगाया जा सकता है लेकिन भारत में इसे सामान्य काल के दौरान भी लगाया जा सकता है।

PD ACT का महत्व सामान्य काल में भी कम नहीं है. इसी कारण हमारे संविधान ने भी भारतीय संसद को यह अधिकार दिया हुआ है। कि वह देश की रक्षा, कानूनी व्यवस्था तथा भारतीय संघ की रक्षा आदि के लिए निवारक नजरबंदी कानून (Preventive Detention Act) को बना सकती है। इस प्रकार का कानून बनाने का अधिकार राज्य के विधान मंडलों को भी  दिया गया है।

PD ACT के तहत गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के लिए संविधान द्वारा कुछ सुरक्षाएँ भी दी गई है :-
भारतीय संविधान ने PD ACT के तहत गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के लिए संविधान द्वारा कुछ सुरक्षाएँ प्रदान की हैं , जो निम्नलिखित हैं।
1 . सलाहकार बोर्ड की स्थापना ( Establishment of Advisory Board ) -संविधान द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि जो भी व्यक्ति इस कानून के अधीन 3 मास से अधिक बन्दी को तभी रखा जाएगा , जब उसका मामला एक सलाहकार बोर्ड के समक्ष पेश किया जाएगा । यदि यह बोर्ड सन्तुष्ट हो जाए कि व्यक्ति को राज्य की सुरक्षा के हित में बन्दी रखना आवश्यक है , तो सरकार उसे बन्दी रख सकेगी अन्यथा उसे तीन माह बाद छोड़ दिया जाएगा ।
सलाहकार बोर्ड के सदस्य होने के लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की योग्यताएँ निश्चित की गई हैं , ताकि बन्दियों के बारे में निष्पक्ष फैसला हो सके , परंतु यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि ये सदस्य इतने निष्पक्ष नहीं हो सकते , जितने कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश । उन पर कार्यपालिका का थोड़ा – बहुत नियन्त्रण अवश्य रहता है । फिर भी उनका काम सराहनीय रहा है और उन्होंने बहुत से बन्दियों को छुड़वाया है ।
2. नज़रबन्दी के आधार जरुरी -संविधान में यह भी व्यवस्था की गई है कि जिस व्यक्ति को निवारक नज़रबन्दी कानून के अधीन बन्दी बनाया जाएगा , तो बन्दी बनाने वाली सत्ता उसे यह सूचित कि उसे किस आधार पर बन्दी बनाया गया है । इसके अलावा उसे अवसर दिया जाएगा कि वह अपने नज़रबन्दी आदेश के विरुद्ध प्रार्थना – पत्र दे सके

PD ACT का काफी समय से व‍िरोध भी हो रहा है। जैसा कि इसका जिक्र हमने ऊपर भी किया है। वर्ष 2020 में इसके तहत 89 हजार से ज्‍यादा लोगों को इस एक्ट के तहत ग‍िरफ्तार किया गया था। ऐसे में अक्‍टूबर 2021 में लगभग 100 रिटायर्ड प्रशासनिक अध‍िकार‍ियों ने केंद्रीय कानून मंत्री को पत्र ल‍िखकर इस एक्‍ट को खत्‍म करने की मांग की थी। उनका कहना था क‍ि इस एक्ट का दुरुपयोग हो रहा और यह मौल‍िक अध‍िकारों का हनन है।

PD ACT और मौल‍िक अध‍िकारों का सम्बन्ध

अगर किसी भी व्यक्ति को इस एक्ट के तहत गिरफ्तार किया जाता है तो भारतीय सविधान के आर्टिकल 21 के अनुसार गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उ उसकी गिरफ्तारी का कारण बताना होगा तथा साथ में उसे 24 घंटे के अंदर नजदीक मजिस्ट्रेट के समने पेस करना होगा। लेकिन इस एक्ट के तहत तो ये दोनों ही बाते लागु नहीं होती है। तो क्या ये हमारा मौलिक अधिकारों का हनन नहीं हो रहा है। इस बात का जबाव आपको आर्टिकल 21 में दिया हुआ है।

क्या इस एक्ट के द्वारा कोई भी सरकार तानाशाही हो सकती है ?

इस कानून का प्रयोग बहुत सोच-समझकर होना चाहिए, परंतु व्यवहार में यह होना बहुत कठिन है। क्युकी , सत्ताधारी दल मतलब जिसकी अभी सरकार हो , कभी भी इस कानून का दुरुपयोग कर सकता है, जिससे लोकतन्त्रीय प्रणाली के स्थान पर तानाशाही की स्थापना हो सकती है, परंतु इस तथ्य के साथ हमें यह भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि भारत में राष्ट्र विरोधी तत्त्वों को नियन्त्रण में रखने के लिए ऐसे कानून का होना आवश्यक है। अन्त में, हम सरलतापूर्वक कह सकते हैं कि निवारक नज़रबन्दी कानूने एक ऐसी दो धारी तलवार है, जिसका प्रयोग राष्ट्र हित के साथ-साथ लोकतन्त्र के समर्थकों के विरुद्ध भी किया जा सकता है। यह किसी भी देश के लिए अपनी सुरक्ष के लिए इस प्रकार के एक्ट को लागु करना भी जरूरी हो जाता है।

क्या PD ACT अब भी है ?

नहीं ,क्युकी इस एक्ट के स्थान पर संसद ने 1 january 1970 को सामप्त कर दिया गया। इस के स्थान पर 7 मई 1971 को प्रेजिडेंट ने इक अध्यादेश जारी करके M.I.S.A. (Maintenance of Internal Security Act ) पास किया गया। सन 1969 में संसद ने इसे दोबारा पास नहीं किया।
संघीय सरकार द्वारा पारित यह कानून नहीं है ,परंतु कई राज्य विधानमंडल ने इस प्रकार के कानून पास कर रखें है।

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निवारक निरोध व्यवस्था के अंतर्गत बने कनून
M.I.S.A. (Maintenance of Internal Security Act ) ,1970
N.S.A (National Security Act ), 1980
N.S.A (National Security Act ), 1983
POTO ( Prevention of Terrorism Ordinance ) , 2001
POTA (Prevention of Terrorism Act ) 2002

article 21 

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