MISA क्या है ? क्यों जिसमें गिरफ्तारी के नाम से ही कांपने लगती है। रूह

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MISA. आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम (Maintenance of Internal Security Act (M.I.S.A.) PD ACT को समाप्त करके 7 मई 1971 को प्रेजिडेंट के एक अध्यादेश के रूप में जारी किया जिसे जून 1971 में यह अध्यादेश कानून का रूप ले लिया था। इस लेख में जानगे की क्यों यह PD ACT को 1 जनवरी 1970 को समाप्त करके उसकी जगह पर यह कानून लाया गया। यह एक्ट कितना खतरनाक था इसका अंदाजा आप इस लेख को पढ़ने के आप लगा पाएगे। की क्यों आज भी इस एक्ट के दौरान बंदी बनाये गए लोग आज भी उसी पल को याद सकते है। इस लेख में आपको बहुत ही आसान भाषा में ऐसे समझाया जाएगा।

MISA क्या है .

सन 1950 में बनाया गया पीडी एक्ट या निवारक नजरबंदी कानून को 1969 में संसद ने दोबारा पास नहीं किया। अब निवारक नजरबंदी एक्ट संघीय सरकार द्वारा पारित कोई भी कानून नहीं है. लेकिन कई राज्य विधान मंडलों ने इस प्रकार के कानून पास कर रखे हैं. 1 जनवरी 1970 निवारक नजरबंदी कानून को समाप्त कर दिया गया और इसके स्थान पर 7 मई 1971 को राष्ट्रपति ने अध्यादेश जारी किया जो जून 1971 में इस अध्यादेश ने कानून का रूप ले लिया गया। मीसा कानून साल 1971 में लागू किया गया था लेकिन इसका इस्तेमाल आपातकाल के दौरान कांग्रेस विरोधियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डालने के लिए किया गया. मीसा यानी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम में आपातकाल के दौरान कई संशोधन किए गए थे।

 

misa act

7 मई , 1971 को राष्ट्रपति ने आन्तरिक सुरक्षा अधिनियम अर्थात् M.I.S.A. अध्यादेश जारी किया और जून , 1971 में इस अध्यादेश ने कानून का रूप प्राप्त किया । 26 जून , 1975 को संकटकाल की घोषणा के पश्चात् राष्ट्रपति ने 30 जून को M.I.S.A. में संशोधन करने के लिए एक अध्यादेश जारी किया , जिसके अन्तर्गत गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए सरकार एक वर्ष तक कैद में रख सकती थी । 16 जुलाई , 1975 को राष्ट्रपति ने एक और अध्यादेश जारी किया , जिसके अनुसार M.I.S.A.  के अन्तर्गत गिरफ्तार किया गया व्यक्ति प्राकृतिक कानून के अधीन निजी स्वतन्त्रता के अधिकार की माँग नहीं कर सकता । 26 जुलाई , 1975 को संसद ने इन दोनों अध्यादेशों को कानून का रूप दे दिया । 26 जून , 1976 को राष्ट्रपति ने एक और अध्यादेश जारी करके यह व्यवस्था की कि M.I.S.A. के अधीन गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए एक वर्ष की बजाय दो वर्ष तक जेल में रखा जा सकता है । इसके अन्तर्गत सरकार ने विरोधी दल के सभी महत्त्वपूर्ण नेताओं को पकड़कर जेल में डाल दिया । जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर लाल कृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, जॉर्ज फर्नांडिस, रविशंकर प्रसाद तक शामिल थे. M.I.S.A की कड़ी आलोचना की गई और इसको व्यक्तिगत स्वतन्त्रता मतलब आर्टिकल 21 का घातक कहा गया । सन् 1977 में जब देश में आम चुनाव हुए जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा – पत्र में ही यह वायदा किया कि यदि उनके दल की सरकार बनी , तो वह M.I.S.A. को समाप्त कर देगी । इन चुनावों के पश्चात् केन्द्र में जब जनता दल की सरकार बनी , तो M.I.S.A को समाप्त करने के लिए लोकसभा में एक बिल पेश किया गया । इस बिल को 19 जुलाई , 1978 को लोकसभा तथा 27 जुलाई , 1978 को राज्यसभा ने पास कर दिया । राष्ट्रपति के बिल पर हस्ताक्षर होने पर M.I.S.A. समाप्त हो गया । ये कहानी इसके बनने की थी अब हम बात करेंगे की आपात काल दौरान इसके इस्तेमाल पर।

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केंद्र में सत्ताधारी दल ने आपातकाल के बहाने विपक्षी दलो को घेरने में लगी है। जून 1975 में लगाया गया आपातकाल ( भारतीय सविधान से आर्टिकल 356 के तहत ) जो की शायद कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल थी। जिसका नुकसान आजतक पार्टी झेल रही है। इस दौरान लगाए गए मीसा कानून के तहत विपक्ष के तमाम नेताओं को जेल में डाल दिया गया, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर लाल कृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, जॉर्ज फर्नांडिस, रविशंकर प्रसाद तक शामिल थे. इंदिरा गांधी की निरंकुश सरकार ने इसके जरिए अपने राजनीतिक विरोधियों को कुचलने का काम किया. मीसा बंदियों से भरी जेलें मीसा और डीआरआई के तहत एक लाख से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया. आपातकाल के वक्त जेलों में मीसाबंदियों की बाढ़ सी आ गई थी. नागरिक अधिकार पहले ही खत्म किए जा चुके थे और फिर इस कानून के जरिए सुरक्षा के नाम पर लोगों को प्रताड़ित किया गया, उनकी संपत्ति छीनी गई. बदलाव करके इस कानून को इतना कड़ा कर दिया गया कि न्यायपालिका में बंदियों की कहीं कोई सुनवाई नहीं थी. कई बंदी तो ऐसे भी थे जो पूरे 21 महीने के आपातकाल के दौरान जेल में ही कैद रहे।

मीसा एक्ट को जब 1977 में जनता पार्टी की बनी तो ख़त्म कर दिया गया लेकिन ये राजनितिक सिलसिला अभी ख़त्म नहीं हुआ था। मीसा एक्ट के बाद दोबारा कांग्रेस की सर्कार के द्वारा एक और एक्ट लाया गया जिसे NSA कहा गया। यह भी मीसा की तरह बहुत खतरनाक था अगले लेख में हम इसी एक्ट के बारे में विस्तार से पढने वाले है।

 

क्या है उपा एक्ट : Unlawful Activities Prevention Act (UAPA ) 

अगस्त 2019 में ही इसका संशोधन बिल संसद में पास हुआ था, जिसके बाद इस कानून को ताकत मिल गई कि किसी व्यक्ति को भी जांच के आधार पर आतंकवादी घोषित किया जा सकता है.
टाडा व पोटा की तरह उपा एक्ट भी गैरकानूनी कार्यों को रोकने के लिए सख्त कानून था। इस एक्ट को उपा यानि Unlawful Activities Prevention Act यानी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम कई नामो से जाना जाता है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य आतंकी गतिविधियों पर रोकथाम लगाना है. पुलिस और जांच एजेंसियां इस कानून के तहत ऐसे आतंकियों, अपराधियों और संदिग्धों को चिन्हित करती है, जो आतंकी गतिविधियों में शामिल होते हैं.

यूएपीए कानून को साल 1967 में लाया गया था. इस कानून में लगातार संशोधन होते रहे है 2019 में यूएपीए कानून में में कुछ बदलाव किया गया. जिसके बाद से इस कानून के तहत जांच के आधार पर किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को आंतकवादी घोषित किया जा सकता है. यूएपीए में विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया जाता है। अगर में आपको इसका कोई अगर उदाहण दु तो शायद आपको अजय देवगन की दिलजले मूवी याद होगी जिस में किस तरह से अजय देवगन को इक आंतकवादी घोषित जाता है। हम आपको इस प्रकार का उदाहण इसलिए दे रहे ताकि पास इस एक्ट को आसानी से याद कर पाए।

अग्रिम जमानत भी नहीं मिलती है।

बताया जाता है कि अगर किसी शख्स पर UAPA के तहत अगर किसी व्यक्ति पर केस दर्ज हुआ है, तो उसे अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती. यहां तक कि अगर पुलिस ने उसे छोड़ दिया हो तब भी उसे अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती. दरअसल, कानून के सेक्शन 43D (5) के मुताबिक, कोर्ट शख्स को जमानत नहीं दे सकता, अगर उसके खिलाफ Unlawful Activities Prevention Act केस बनता है.

गैरकानूनी संगठनों, आतंकवादी गैंग और संगठनों की सदस्यता को लेकर इसमें बहुत कड़ी सजा का प्रावधान है. सरकार द्वारा घोषित आतंकी संगठन का सदस्य पाए जाने पर आजीवन कारावास की सजा मिल सकती है. लेकिन कानून में ‘सदस्यता’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है. कई एक्टिविस्टों पर इस कानून के तहत केस दर्ज हो चुके हैं.

आशा करते है की हमारे द्वारा दी जानकारी आपको पसंद आए होगी अगर आपके इस लेख में दी गई जानकारी से कोई संदेह है। तो हमे कमेंट बॉक्स में बता सकते है। अगर आपके पास भी ऐसी कोई जानकारी जिसे आप हम तक पहुंचा सकते है।

 

निवारक निरोध व्यवस्था के अंतर्गत बने कनून
 PD ACT (Preventive Detention Act ) ,1950N.S.A (National Security Act ), 1980
N.S.A (National Security Act ), 1983
POTO ( Prevention of Terrorism Ordinance ) , 2001
POTA (Prevention of Terrorism Act ) 2002

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