Comptroller and Auditor General of India CAG जानिए पुरे विस्तार में

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Comptroller and Auditor General of India CAG ( नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक या कैग या कागजी शेर भी कहा जाता है।) भारतीय संविधान के भाग 5 के अनुच्छेद 148 से 151 में बताया गया है। जिसकी अधिकृत किए जाने पर ही सरकारी खजाने से पैसे निकाले जाते है। भारत के संविधान का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी है। वह ऐसा व्यक्ति है जो यह देखता है कि संसद द्वारा अनुमन्य खर्चों की सीमा से अधिक धन खर्च न होने पाए या संसद द्वारा विनियोग अधिनियम में निर्धारित मदों पर ही धन खर्च किया जाए। सीएजी के क्या कार्य हैं। कैसी इसकी नियुक्ति होती है. कौन करता है इन सभी का जिक्र इस लेख में आपको पूरा पढ़ने के बाद मिल जाएगा।

Comptroller and Auditor General of India CAG पद क्यों है।

सरकारी खजाने से सरकार द्वारा पैसा निकालने के लिए ब्रिटेन में CAG का प्रस्वीकृत पत्र लेना होता है। जिससे कि लोगों को यह भरोसा दिलाया जा सके कि सरकार को फिजूलखर्ची नहीं कर सकती है क्योंकि उसकी आय व्यव संबंधी लेखा जोखा एक गैर राजनीतिक संस्था के ऊपर हैं। भारत में भी इसी तर्ज के अनुसार अनुच्छेद 148 में इस पद को बनाया गया है। डॉक्टर अंबेडकर के अनुसार यदि कोई उनसे पूछें भारतीय संविधान के अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण पद कौन सा है तो कैग का नाम लेंगे क्योंकि उन्होंने बताया है , इसका कार्य न्यायपालिका से भी अधिक महत्वपूर्ण बताया तथा न्यायपालिका की भांति इसे भी स्वतंत्र होना चाहिए वास्तव में अनुच्छेद 148 यह साफ-साफ बताता है कि इसे विधायिका और कार्यपालिका के विरुद्ध संविधानिक संरक्षण प्रदान किया गया है। इस पद की महत्वता इस कारण से भी है। ऐसी के सुझाव पर ही राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल लेखा का वर्गीकरण की व्यवस्था करते हैं जैसे क्षेत्रीय लेखा शीर्ष , दीर्घ लेखा शीर्ष, लघुलेखा शीर्ष ,उप क्षेत्रीय लेखा शीर्ष इत्यादि।

कैग (CAG) की स्थापना कब हुई

1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथों में लिया तभी से एक महालेखाकार का कार्यकाल प्रारंभ होता है। 1860 एडवर्ड ड्रम को पहले ऑडिटर जनरल के रूप में अपना कार्यकाल संभाला उसके कुछ समय बाद भारत के महालेखा परीक्षक को भारत सरकार का लेखा परीक्षक और महालेखाकार कहा जाने लगा। 1866 में नाम बदल कर नियंत्रक महालेखा परीक्षक नाम दिया गया और 1887 में इसे भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के रूप में किसे नामित किया गया भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति मुख्य रूप से 1935 के भारत शासन अधिनियम के द्वारा की गई है

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का कार्यकाल (अनुच्छेद 148 )

भारतीय सविधान के अनुच्छेद 148 में यह बताया गया है कि भारत का एक नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक होगा। जिसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति के द्वारा की जाएगी यह अपने पद पर तब तक बना रहेगा जब तक कि वह 65 वर्ष की उम्र या 6 वर्ष का कार्यकाल इन दोनों में से जो पहले हो ,को प्राप्त करेगा उसका कार्यकाल समाप्त होगा। लेकिन सेवानिवृति के बाद किसी भी लाभ का पद धारण नहीं कर सकता है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को हटाने की वही प्रक्रिया होगी जो भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के हटाने की प्रक्रिया है। इसको वेतन भी भारत की संचित निधि से दिया जाता है

क्या आपने कभी सोचा है कि देश में बहुत सारे हैं घोटाले हुए हैं उन घोटालों को उजागर कौन करता है आज किसी लेख में आपको हम घोटालों की प्रोसेसिंग प्रक्रिया और उन को उजागर करने के बारे में बताएंगे भारत सरकार अपना हर साल एक बजट पेश करता है इस बजट में अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग कार्यों के लिए लेखा-जोखा रखा जाता है कीमा लीजिए कि किसी राज्य को किसी कार्य के लिए कुछ पैसे दिए गए इन पैसों का हिसाब सीएजी भारत सरकार की तरफ से कभी भी उस सरकार से मांग सकता है .

List of CAG India

वी. नरहरी राव                                      1948 -1954

ए के चंदा                                              1954 -1960

एक के रॉय                                           1960 -1966

एस. रंगनाथन                                       1966 -1972

ए बक्षी                                                  1972 -1978

ज्ञान प्रकाश                                           1978 -1984

टी एन चतुर्वेदी                                       1984 -1990

सी जी सोमैया                                        1990 -1996

वी के सुन्ग्लू                                          1996 -2002

वी एन कौल                                         2002 -2008

विनोद राय                                          2008 -2013

शशि कान्त शर्मा                                  2013 –अब तक

अनुच्छेद 150 नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India CAG )के कार्य

सीएजी के कार्य सन 1976 में इंदिरा गांधी के सरकार के द्वारा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का विभागीय करण किया मतलब सीएजी के अधिकार और कर्तव्यों को बांटकर उसके पास केवल लेखा परीक्षण का ही कार्य रहने दिया। 1976 से CAG के कुछ कार्य रह गए।
पहला सभी सरकारी विभागों और मंत्रालयों उनके अधीन कार्यरत प्रशासनिक इकाइयों (केंद्र व राज्य सरकार दोनों ) के खर्चों का लेखा परीक्षण करना इसके साथ साथ समेकित निधि में सरकार द्वारा डाले गए पैसों का भी परीक्षण करना आय व्यव दोनों का लेखा परीक्षण करना
आपात कोष से होने वाले लेन देन का लेखा परीक्षण करना
लोक लेखा कोष से होने वाले लेनदेन का लेखा परीक्षण करना मुख्यतः सरकार द्वारा लिए गए ऋण, जमा और भुगतान की गई राशियों का लेखा परीक्षण करना
किसी सरकारी विभाग के अंतर्गत संचालित खातों से होने वाले लेन देन जैसे व्यापार, विनिर्माण ,लाभ तथा हानि और लेखा परीक्षण (बैलेंस शीट) पर दर्ज वस्तुओं/राशि आदि का लेखा परीक्षण करना
संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित समिति सांविधिक निगम (लोक निगम) आय व्यय का लेखा परीक्षण ( कुछ निगम जैसे RBI ,SBI ,GIC इत्यादि सीएजी से लेखा परीक्षण नहीं करवाती क्योंकि राष्ट्रपति या संसद इसके लिए सीएजी को अधिकृत नहीं किया है। इसी कारण राज्य सरकारों के अंतर्गत कार्यरत कई निगम जैसे राज्य लोकहित निगम सीएजी से लेखा परीक्षण नहीं करवाते हैं।
1956 के कंपनी अधिनियम ( 2013 में संशोधित ) किया गया के अनुसार निर्मित अथवा गठित कोई भी सरकारी कंपनी जिसमें सरकार की हिस्सेदारी 51% से अधिक हो इन सभी कंपनियों के आय और व्यय कर व्यापार निर्माण ,स्टॉक और शेयर आदि का लेखा परीक्षण करना (बशर्ते की CAG को इसके लिए अधिकृत किया गया हो।
ऐसे निकाय और प्राधिकरण जिसको सरकार द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। भले ही वह सहायता मामूली ही क्यों ना हो लेखा परीक्षण करेगी ( राष्ट्रपति या राज्यपाल के निर्देशक अनुसार ही किया जाएगा )
कोई भी ऐसा संगठन , प्राधिकरण या निकाय जो कि सार्वजनिक कार्यों के लिए सरकार से ऋण लेता है।

सीएजी स्थानीय निकायों का लेखा परीक्षण नहीं करता है हालांकि यदि किसी राज्य के राज्यपाल के द्वारा उसी इसके लिए अधिकृत किया जाता है तो वह लेखा परीक्षण कर सकता है। संघ राज्य और सम्मिलित सरकारी के आय और व्यय का लेखा परीक्षण तभी कर सकता है जब राष्ट्रपति उसे इसके लिए अधिकृत करें। इसका मतलब यह है कि सरकार अगर किसी राज्य को किसी कार्य के लिए पैसा देता है तो उसका हिसाब सीएजी उस राज्य से कभी भी मांग सकता है जिसका उन्होंने खर्च किया हुआ है और इसी से ही घोटालों का उजागर सामने आता है

Comptroller and Auditor General of India CAG द्वारा पकड़े गए घोटाले जो की निम्नलिखित है

भ्रष्टाचार को मात देने के लिए सीएजी कई बार बड़े बड़े घोटालों को पकड़ने की कोशिश करता है. और उनको उजागर भी किआ है।जैसे कॉमनवेल्थ गेम घोटाला कॉमनवेल्थ घोटाला साल 2011 में सामने आया और इसे भारत के सबसे बड़े घोटालों में से एक कहा जाता है। माना जाता है कि दिल्ली में आयोजित हुए इन खेलों में बड़े पैमाने पर पैसों का घपला किया गया. अनुमान के मुताबिक कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले में देश को 70 हजार करोड़ रुपये का चूना लगाया गया. इस पूरे घोटाले में जो सबसे बड़े आरोपी पूर्व कांग्रेस सासंद सुरेश कलमाड़ी थे जो आयोजन समिति के अध्यक्ष भी थे.इसमें घोटाला में करोड़ो रूपये तो पानी की बाल्टी के ऊपर लगते हुआ दिखाया गया था।
2जी स्पेक्ट्रम घोटाला यूपीए सरकार के दौरान सीएजी ने 2जी के लाइसेंस और आवंटन को लेकर एक रिपोर्ट जारी किया था, जो बहुत दिनों तक विवादों में रही थी इस रिपोर्ट के अनुसार इस सरकार के दौरान ये एक बहुत बड़ा घोटाला था. ये घोटाला दरअसल टेलिकॉम कंपनियों को 2 जी सब्सक्रिप्शन के लाइसेंस आवंटन से सम्बंधित था. फ़रवरी 2002 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक पीआईएल जारी किया जिसके अंतर्गत कोर्ट ने इस स्पेक्ट्रम आवंटन को असंवैधानिक बताया. साथ ही सन 2008 में जारी हुए सभी 122 लाइसेंस को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया. ये घोटाला साल 2010 में सामने आया जब भारत के महालेखाकार और नियंत्रक (कैग) ने अपनी एक रिपोर्ट में साल 2008 में किए गए स्पेक्ट्रम आवंटन पर सवाल खड़े किए.2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कंपनियों को नीलामी की बजाए पहले आओ और पहले पाओ की नीति पर लाइसेंस दिए गए थे, जिसमें भारत के महालेखाकार और नियंत्रक के अनुसार सरकारी खजाने को अनुमानत एक लाख 76 हजार करोड़ रुपयों का नुक़सान हुआ था.
कोल माईन आवंटन : सन 2012 में तात्कालिक सरकार की मौजूदगी में ये भी एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार था. इसी साल इस आवंटन को लेकर सीएजी की रिपोर्ट ने भारतीय मीडिया में हडकंप मचा दी थी. इसी साल सदन के मानसून सत्र के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने सदन में इसका विरोध किया और तात्कालिक प्रधानमंत्री के इस्तीफ़े की मांग की.
फोडर स्कैम : सन 1995 में ये घोटाला भी सीएजी के एक रिपोर्ट की ही वजह से लोगों के बीच आया. इस रिपोर्ट के तहत सीएजी तात्कालिक सरकार पर सरकारी खजाने से लगभग 140 मिलियन डॉलर के घोटाले का आरोप लगाया. पटना हाई कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने इस घोटाले की छान बीन की नालंदा में शिक्षक भर्ती घोटाला में एक और कार्रवाई हुई है। नियोजित शिक्षकों के फोल्डर गायब होने के मामले में पांच पंचायत सचिवों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है । पंचायत सेवक पर एफआईआर की सूचना मिलते ही नियोजन इकाई में हड़कंप मच गया।

CAG सरकारी नीति की आलोचना क्यों नहीं कर सकता है

सीएजी कभी भी किसी भी सरकारी योजना या नीति की आलोचना नहीं कर सकता है। क्योंकि संसदीय मूलक प्रणाली में सरकार को उसके कार्य या नीतियों के लिए उत्तरदाई हटाने का अधिकार मूलतः संसद को या न्याय पालिका को। न्याय पालिका न्याय समीक्षा के अंतर्गत सरकार की नीतियों आलोचना कर सकती है। इसलिए इन दोनों के अतिरिक्त किसी अन्य संस्था को सरकार की नीति की आलोचना करने का संविधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है
भारत के एक पूर्व सीएजी हुए हैं टीएन चतुर्वेदी इनके अनुसार 1971 काकैग के अधिकार, कर्तव्य व सेवा शर्तों नियमों कैद को परफॉर्मेंस लेखा परीक्षण का अधिकार देता है। मतलब की यह सरकार की नीतियों पर टिप्पणी कर सकता है.जब इन नीतियों या कार्यो से सरकारी खजाने को हानि पहुंचती हो ,यही कारण है। की कैग की रिपोर्ट को अंतिम रूप से जांचने के लिए लोक लेखा समिति को यह अधिकार प्राप्त है जो कि संसद की एक स्थाई समिति है। और जिसका अध्यक्ष विपक्ष दल का होता है।

CAG अपनी रिपोर्ट किसको प्रस्तुत करता है

CAG अपनी रिपोर्ट सबसे पहले राष्ट्रपति को सौंपी जाती है राष्ट्रपति इस रिपोर्ट को लोकसभा के अध्यक्ष को देता है लोकसभा अध्यक्ष के द्वारा रिपोर्ट संसद की एक स्थाई समिति लोक लेखा समिति को दी जाती है जो कि सीएजी की अंतिम रूप से परीक्षण करने का अधिकार इसी समिति को प्राप्त है। यह संसद की एक स्थाई समिति है जिसका अध्यक्ष विरोधी दल का नेता होता है इस समिति के अंदर लोकसभा के 15 सदस्य राज्यसभा के सदस्य 7 सदस्य होते हैं। जो कि सरकारी नीतियों की कड़ी आलोचना कर सकती है। जो कि सीएजी की रिपोर्ट पर ही आधारित होती है

क्या Comptroller and Auditor General of India CAG शब्द उपयुक्त है

नहीं केवल ब्रिटिश विरासत के कारण यह शब्द प्रयुक्त होता है वास्तव में इस पद का कोई व्यवहारिक उपयोग नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है। कि भारत में सरकारी खजाना या संचित निधि से पैसा निकालने के लिए विभागीय सचिव को प्राधिकार प्राप्त है जबकि इसके विपरीत ब्रिटेन में यह अधिकार CAG को प्राप्त है अतः भारत के संदर्भ में कंट्रोलर शब्द का कोई अर्थ नहीं है।

CAG की आलोचना

एक अमेरिका के प्रशासनिक चिंतन पॉल। H .एकलबी हुए हैं जिन्होंने कुछ आधार पर CAG की आलोचना की है।
इनके अनुसार यह एक ब्रिटिश विरासत है जिसके भारत के संदर्भ में कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि भारत में कंट्रोलर एक अनाम पद है।
CAG को विशेषज्ञ सेवाएं प्राप्त नहीं है और जहां तक प्रशासनिक दक्षता का प्रश्न है तो किसी विभाग का अप्पर सचिव प्रशासनिक कार्यों को कैग में बेहतर समझता है।
इन आलोचनाओं के बावजूद भी भारत के पहलेकैग नरसिंह राव और दूसरे के अशोक चंदा इस पद को सरकारी खजाने के संरक्षक के रूप में आवश्यक मानते हैं। उनके अनुसार इनकी रिपोर्ट का व्यापक प्रचार प्रसार होने के कारण सरकार पर नियंत्रण व दबाव बना रहता है कि वह लोगों की दृष्टि में कोई ऐसा कार्य न करें जिससे सरकार के प्रति लोगों की दृष्टि बदले और लोग सरकार को कटघरे में खड़ा करें।

 

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